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बुधवार, 1 सितंबर 2010

रेडियो की यादें (भाग-2) (विविध भारती और टीवी उदघोषकों के बारे में)

All India Radio Vividh Bharti Doordarshan
1982 के एशियाड के समय भारत में रंगीन टीवी का उदय हुआ, हालांकि लगभग 1990 तक कलर टीवी भी एक “लग्जरी आयटम” हुआ करता था (अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखिये कि अब कलर टीवी चुनाव घोषणा पत्रों में मुफ़्त में बाँटे जाने लगे हैं)। “सुदर्शन चेहरे वाले” कई उदघोषक रेडियो से टीवी की ओर मुड़ गये, कुछ टीवी नाटकों / धारावाहिकों में काम करने लगे थे। उन दिनों चूंकि टीवी नया-नया आया था, तो उसका काफ़ी “क्रेज” था और उस दौर में रेडियो से मेरा नाता थोड़ा कम हो गया था, फ़िर भी उदघोषकों के अल्फ़ाज़, अदायगी और उच्चारण की ओर मेरा ध्यान बराबर रहता था। अन्तर सिर्फ़ इतना आया था कि टीवी के कारण मुखड़े का दर्शन भी होने लगा था इसलिये शम्मी नारंग, सरला माहेश्वरी, जेवी रमण, सरिता सेठी आदि हमारे लिये उन दिनों आकर्षण का केन्द्र थे। सरला माहेश्वरी को न्यूज पढ़ते देखने के लिये कई बार आधे-आधे घंटे यूँ ही बकवास सा “चित्रहार” देखते बैठे रहते थे। वैसे मैंने तो मुम्बई में बचपन में स्मिता पाटील और स्मिता तलवलकर को भी टीवी पर समाचार पढ़ते देखा था और अचंभित हुआ था, लेकिन “हरीश भिमानी” की बात ही कुछ और थी, महाभारत के “समय” तो वे काफ़ी बाद में बने, उससे पहले कई-कई बार उन्हें सुनना बेहद सुकून देता था। टीवी के आने से उदघोषकों का चेहरा-मोहरा दर्शनीय होना अपने-आप में एक शर्त थी, उस वक्त भी तबस्सुम जी अपने पूरे शबाब और ज़लाल के साथ पर्दे पर नमूदार होती थीं और बाकी सबकी छुट्टी कर देती थीं। रेडियो के लिये उन दिनों मंदी के दिन थे ऐसा मैं मानता हूँ। फ़िर से कालचक्र घूमा, टीवी की दुनिया में ज़ीटीवी नाम के पहले निजी चैनल का प्रवेश हुआ और मानो धीरे-धीरे उदघोषकों की शुद्धता नष्ट होने लगी। लगभग उन्हीं दिनों आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरु हुआ था, अंग्रेजी लहजे के उच्चारण और अंग्रेजी शब्दों की भरमार (बल्कि हमला) लिये हुए नये-नवेले उदघोषकों का आगाज़ हुआ, और जिस तेजी से फ़ूहड़ता और घटियापन का प्रसार हुआ उससे संगीतप्रेमी और रेडियोप्रेमी पुनः रेडियो की ओर लौटने लगे। उदारीकरण का असर (अच्छा और बुरा दोनो) रेडियो पर भी पड़ना लाजिमी था, कई प्रायवेट रेडियो चैनल आये, कई योजनायें और भिन्न-भिन्न तरीके के कार्यक्रम लेकर आये, लेकिन एक मुख्य बात से ये तमाम रेडियो चैनल दूर रहे, वह थी “भारतीयता की सुगन्ध”। और इसी मोड़ पर आकर श्रोताओं के बीच “विविध भारती” ने अपनी पकड़, जो कुछ समय के लिये ढीली पड़ गई थी, पुनः मजबूत कर ली।

विविध भारती, जो कि अपने नाम के अनुरूप ही विविधता लिये हुए है, आज की तारीख में अधिकतर लोगों का पसन्दीदा चैनल है। लोगबाग कुछ समय के लिये दूसरे “कांदा-भिंडी” टाइप के निजी रेडियो चैनल सुनते हैं, लेकिन वे सुकून और शांति के लिये वापस विविध भारती पर लौटकर आते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे कि हॉट-डॉग खाने वाले एकाध-दो दिन वह खा सकते हैं, लेकिन पेट भरने और मन की शांति के लिये उन्हें दाल-रोटीनुमा, घरेलू, अपनी सी लगने वाली, विविध भारती पर वापस आना ही पड़ेगा। मेरे अनुसार गत पचास वर्षों में विविध भारती ने अभूतपूर्व और उल्लेखनीय तरक्की की है, जाहिर है कि इसे सरकारी मदद मिलती रही है, और इसे चैनल चलाने के लिये “कमाने” के अजूबे तरीके नहीं आजमाना पड़े, लेकिन फ़िर भी सरकारी होने के बावजूद इसकी कार्यसंस्कृति में उत्कृष्टता का पुट बरकरार ही रहा, और आज भी है।

विविध भारती के मुम्बई केन्द्र से प्रसारित होने वाले लगभग सभी कार्यक्रम उत्तम हैं और उससे ज्यादा उत्तम हैं यहाँ के उदघोषकों की टीम। मुझे कौतूहल है कि इतने सारे प्रतिभाशाली और एक से बढ़कर एक उदघोषक एक ही छत के नीचे हैं। कमल शर्मा, अमरकान्त दुबे, यूनुस खान, अशोक सोनावणे, राजेन्द्र त्रिपाठी, महेन्द्र मोदी… इसी प्रकार महिलाओं में रेणु बंसल, निम्मी मिश्रा, ममता सिंह, आदि। लगभग सभी का हिन्दी उच्चारण एकदम स्पष्ट, आवाज खनकदार, प्रस्तुति शानदार, फ़िल्मों सम्बन्धी ज्ञान भी उच्च स्तर का, यही तो खूबियाँ होना चाहिये उदघोषक में!!! आवाज, उच्चारण और प्रस्तुति की दृष्टि से मेरी व्यक्तिगत पसन्द का क्रम इस प्रकार है – (1) कमल शर्मा, (2) अमरकान्त दुबे और (3) यूनुस खान तथा महिलाओं में – (1) रेणु बंसल, (2) निम्मी मिश्रा (3) ममता सिंह। इस लिस्ट में मैंने लोकेन्द्र शर्मा जी को शामिल नहीं किया है, क्योंकि वे शायद रिटायर हो चुके हैं, वरना उनका स्थान पहला होता। महिला उदघोषकों में सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं रेणु बंसल, फ़ोन-इन कार्यक्रम में जब वे “ऐस्स्स्स्सा…” शब्द बोलती हैं तब बड़ा अच्छा लगता है, इसी प्रकार श्रोताओं द्वारा फ़ोन पर “मैं अपने मित्रों का नाम ले लूँ” पूछते ही निम्मी मिश्रा प्यार से “लीजिये नाआआआआ…” कहती हैं तो दिल उछल जाता है। ममता सिंह जी, अनजाने ही सही, अपना विशिष्ट “उत्तरप्रदेशी लहजा” छुपा नहीं पातीं। मुझे इस बात का गर्व है कि कई उदघोषकों का सम्बन्ध मध्यप्रदेश से रहा है, और अपने “कानसेन” अनुभव से मेरा यह मत बना है कि एक अच्छा उदघोषक बनने के लिये एक तो संस्कृत और उर्दू का उच्चारण जितना स्पष्ट हो सके, करने का अभ्यास करना चाहिये (हिन्दी का अपने-आप हो जायेगा) और हर हिन्दी उदघोषक को कम से कम पाँच-सात साल मध्यप्रदेश में पोस्टिंग देना चाहिये। मेरे एक और अभिन्न मित्र हैं इन्दौर के “संजय पटेल”, बेहतरीन आवाज, उच्चारण, प्रस्तुति, और मंच संचालन के लिये लगने वाला “इनोवेशन” उनमें जबरदस्त है। मेरा अब तक का सबसे खराब अनुभव “कमलेश पाठक” नाम की महिला उदघोषिका को सुनने का रहा है, लगता ही नहीं कि वे विविध भारती जैसे प्रतिष्ठित “घराने” में पदस्थ हैं, इसी प्रकार बीच में कुछ दिनों पहले “जॉयदीप मुखर्जी” नाम के एक अनाउंसर आये थे जिन्होंने शायद विविध भारती को निजी चैनल समझ लिया था, ऐसा कुछ तरीका था उनका कार्यक्रम पेश करने का। बहरहाल, आलोचना के लिये एक पोस्ट अलग से बाद में लिखूंगा…

व्यवसायगत मजबूरियों के कारण आजकल अन्य रेडियो चैनल या टीवी देखना कम हो गया है, लेकिन जिस “नेल्को” रेडियो का मैने जिक्र किया था, वह कार्यस्थल पर एक ऊँचे स्थान पर रखा हुआ है, जहाँ मेरा भी हाथ नहीं पहुँचता। उस रेडियो में विविध भारती सेट करके रख दिया है, सुबह बोर्ड से बटन चालू करता हूँ और रात को घर जाते समय ही बन्द करता हूँ। ब्लॉग जगत में नहीं आया होता तो यूनुस भाई से भी परिचय नहीं होता, उनकी आवाज का फ़ैन तो हूँ ही, अब उनका “मुखड़ा” भी देख लिया और उनसे चैटिंग भी कर ली, और क्या चाहिये मुझ जैसे एक आम-गुमनाम लेकिन कट्टर रेडियो श्रोता को? किस्मत ने चाहा तो शायद कभी “कालजयी हीरो” अर्थात अमीन सायानी साहब से भी मुलाकात हो जाये…

पाठकों को इस लेख में कई प्रसिद्ध नाम छूटे हुए महसूस होंगे जैसे पं विनोद शर्मा, ब्रजभूषण साहनी, कब्बन मिर्जा, महाजन साहब जैसे कई-कई अच्छे उदघोषक हैं, लेकिन मैंने सिर्फ़ उनका ही उल्लेख किया है, जिनको मैंने ज्यादा सुना है।

सोजन्य  महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar)

http://blog.sureshchiplunkar.com

रेडियो की दुनिया .

 मेरी आवाज ही पहचान है्..
हाय  दिल्ली ये है रेडियो मिर्ची और आप सुन रहे हैं पुरानी जींस विद साइमा। ये आवाज शायद ही कोई दिल्लीवासी होगा जो नहीं पहचानता हो। सिर्फ साइमा ही नहीं, बक-बक पल्लवी, सिमरन, स्वाति, माहिया, नीता जैसी कई आवाज रेडियो पर गूंजती हैं,  जिन्हें सुनकर शहर वासी एफएम रेडियो स्टेशन तक को पहचान लेते हैं। यहां बात हो रही है आवाज की दुनिया की मलिका 'महिला रेडियो जॉकी' की ।
आरजे का क्रेज
एफएम और आरजे को लेकर आज इतना ज्यादा क्रेज है कि युवावर्ग बिना एफएम वाला मोबाइल रखना पसन्द नहीं करते और हमेशा अपने मोबाइल में एफएम ऑन किए सुनते रहते हैं । यह तो आज के जमाने के रेडियो स्टेशन की बात है, लेकिन पहले के समय में भी रेडियो का हाल कुछ ऐसा ही था । अब भी रेडियो का नाम सुनते ही पापा-मम्मी की जुबान पर विविध भारती के अमिन सयानी, निम्मी मिश्रा, रेणु बंसल,  ममता सिंह जैसी कई नाम बरबस याद आ जाते हैं ।
नाम, पैसा, प्रतिष्‍ठा
रेडियो की दुनिया में शुरू से ही महिलाओं का दबदबा कायम है और आज भी ये अपनी मधुर आवाज से लोगों का मनोरंजन कर रही हैं। इसके पीछे कुछ खास वजह भी है-अच्छी आवाज महिलाओं की कुदरती खासियत है, ज्यादा बोलना या गपशप करना लड़कियों की आदत होती है। ऐसे में लड़कियां अपनी इस आदत को अपना प्रोफेशन बना रही हैं । इस प्रोफेशन में नाम, पैसा, प्रतिष्ठा, ग्लैमर सबकुछ है, ये हर दिन नई-नई जानकारियों के साथ अपडेट होते हैं और इनकी आवाज को महत्व दिया जाता है । लाखों की तादाद में लोग इनको सुनते हैं और इनके फैन बन जाते हैं, ये बहुत बड़ी बात है ।
श्रोताओं से संबंध
रेडियो जॉकी भी अपने शो से और अपने श्रोताओं से बहुत प्यार करती हैं तभी तो एक-दूसरे को बिना देखे, बिना जाने भी इनके बीच (आरजे-श्रोता के बीच) गजब का अटूट रिश्ता बन जाता है । इन्दौर की प्रसिद्ध आरजे भावना कहती हैं कि उनका शो उनके बच्चे की तरह है और सारे श्रोता उनके रिश्तेदारों की तरह हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने शो से और अपने श्रोताओं से बेहद प्यार है और ऐसा करने में उन्हें बेहद मजा आता है ।
आरजे स्वाति
हाय मैं हूं स्वाति और आप सुन रहे हैं 93.5 रेड एफएम... बजाते रहो
 दिल्ली की मशहूर आरजे स्वाति ने बताया कि आज के श्रोता सिर्फ गाने सुनने के लिए एफएम नहीं सुनते हैं, उन्हें हर वक्त, हर जगह इन्फॉर्मेशन चाहिए । आज हर आदमी एफएम वाला मोबाइल यूज करता है ताकि वह जहां भी रहे घर में, दफ़्तर में, बस में, ऑटो में या रास्ते में हर जगह वो जानकारियों से अपडेट होता रहे और साथ ही साथ उसका मनोरंजन भी होता रहे।
स्वाति का कहना है कि इस फील्ड में प्रजेंस ऑफ माइण्ड बेहद महत्वपूर्ण है । उन्होंने बताया कि श्रोता वर्ग का ध्यान रखना बेहद जरूरी है । हमारे श्रोता 15 साल के टीनएजर्स से लेकर 50-60 साल के बुजुर्ग तक हैं । ऐसे में सबका खयाल रखना जरूरी है, हमारे साथ हमारे चैनल का नाम (विश्वसनीयता ) जुड़ा होता है, उसे बनाए रखना सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण है ।

रूमी मिल्लक-
हाय मैं हूं दिल्ली की बिल्ली रूमी और आप सुन रहे हैं एफएम रेनबो 102.6 दिल्ली की बिल्ली नाम से प्रसिद्ध आरजे रूमी का कहना है कि बचपन से ही क्रिएटिव काम करने में मजा आता था, बस स्नातक पूरा होते ही यह फील्ड ज्वाइन कर लिया । शुरुआत में तो कुछ कठिनाई आई लेकिन बहुत जल्द मैंने अपनी पहचान बना ली । कई विभिन्न नामी-गिरामी एफएम में आरजे रह चुकी रूमी कहती हैं कि अगर इस फील्ड में सफलता पानी है तो आप अपने विकल्प खुले रखें किसी एक चैनल के होकर ही नहीं रह जाएं। साथ ही, आवाज की दुनिया के लिए मल्टीटास्किंग होना बेहद जरूरी है । उन्होंने बताया कि आरजे के लिए रचनात्मकता, इच्छा और प्रतिभा बेहद जरूरी है । उनका मानना है कि महिलाओं के लिए इसमें ज्यादा संभावनाएं हैं क्योंकि आरजे आवाज की दुनिया है और महिलाओं की अच्छी आवाज कुदरती देन है ।
रूमी का मानना है कि अगर आप इस फील्ड में हैं तो हमेशा प्रोग्राम करने के लिए तैयार रहें क्योंकि कभी भी इसकी जरूरत पड़ सकती है । उन्होंने बताया कि 5-6 साल पहले एफएम हॉटलाइन प्रोग्राम में आरजे नहीं आ पाई । उस शो में आरजे को किसी यंगस्टर्स से बात करनी होती थी उसके बारे में सिर्फ आरजे को पता होता था । ऐसे में उस दिन वह (रूमी) एक 16 साल की लड़की सलोनी बनकर क्यूट आवाज निकालकर लड़की की तरह बात की और प्रोग्राम को सफल बनाया । उसके बाद तो उस लड़की के लिए कई सारे प्रपोजल भी आए । रूमी कहती है कि वह मेरे जीवन का सबसे यादगार क्षण है और ये इस फील्ड की वजह से ही सम्भव हो पाया । रूमी ने बताया कि अच्छी आवाज के साथ-साथ अगर आप कई और तरह की आवाज निकाल सकती हैं और मिमिक्री कर सकती हैं तो आपके लिए संभावना दोगुनी हो जाती है ।

आरजे भावना
गुड आफ़्टरनून के जस्ट एक घंटे पहले वाली गुडमॉर्निंग है जी आप सुन रहे है इन्दौर का अपना रेडियो 94.3 मॉय एफएम और मैं हूं आपकी दोस्त भावनाआरजे भावना का कहना है कि आरजे के फील्ड में आपकी आवाज,आपका अन्दाज, सेंस ऑफ ह्यूमर का बहुत ज्यादा महत्व होता है । इनके बिना आरजे बनना मुश्किल है । उन्होंने बताया कि आरजे की सोच आम लोगों की सोच से हटकर कुछ अलग और नई होनी चाहिए । साथ ही जिस शहर के एफएम में काम कर रहे हों वहां की स्थानीय जानकारी भी होनी चाहिए । तभी वह लोगों से अच्छी तरह से बातचीत कर पाएगी । भावना का मानना है कि आरजे को अपने नेचुरल साउण्ड में शो करना चाहिए किसी की कॉपी नहीं करनी चाहिए तभी वह अपनी पहचान बना पाएगी।
भावना ने बताया कि यह फील्ड लड़कियों के लिए बहुत सही है और इसमें उनके लिए संभावनाएं भी अपार है। उन्होंने बताया कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की कम्यूनिकेशन स्किल ज्यादा अच्छी होती हैं और वह किसी को भी बहुत जल्दी अपना बना सकती हैं । इस वजह से उन्हें ज्यादा मौका मिलता है । उन्होंने बताया कि ये बहुत ग्लैमरस फील्ड है लेकिन अन्य ग्‍लैमरस फील्ड की अपेक्षा ये ज्यादा सही है । हम कहीं भी आराम से आते-जाते हैं, घूमते-टहलते हैं लेकिन हमें कोई पहचान नहीं पाता है । भावना ने बताया कि दो साल पहले अपने जन्मदिन के रात 12 बजे शो खत्म होने के दस मिनट पहले उन्होंने अपने श्रोताओं से कहा कि आज उनका जन्मदिन है। इतना कहते ही दस मिनट के अन्दर 300 से ज्यादा मेल और ढेर सारे फोन आ गए । कुछ ही देर में एक फैन पांच फुट लंबा बुके लेकर ऑपिफस आ गया । इस पल को याद करके भावना रोमांच से भर जाती हैं और इतना मशहूर हाने के लिए इस फील्ड को धन्यवाद देती हैं ।
आरजे भारती हाय गुड मॉर्निंग  दिल्लीवालों आप सुन रहे है एफ एम रेनबो और मैं हूं आपकी दोस्त भारती
भारती बचपन से आरजे बनना चाहती थी लेकिन परिवारवालो के दबाव में आकर एमबीए कर लिया, लेकिन उसे इस फील्ड में घूटन महसूस होने लगा और उसने जॉब छोड़ दी । भारती कहती है कि मन का नहीं करने पर घूटन महसूस होती है इसी वजह से मैंने अपने मन की सुनी और बचपन के ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए आरजे बन गई  और आज मैं बेहद खुश हूं, बहुत अच्छा लगता है जब श्रोता मुझे सुनते है और प्यार से फोन करते है। उसने बताया कि आप चाहे तो किसी और काम के साथ-साथ पार्ट टाइम जॉब के रुप में भी आरजेयिंग कर सकते हैं।
आरजे नीति
रेड एफ की आरजे नीति कहती हैं रेडियो की दुनिया में आवाज का कोई लेना देना नहीं है । हां इतना जरूर है कि आपकी आवाज सुनने में अच्छी लगे । जो जरूरी है वह है आपकी रचनात्मकता । आप कितनी देर तक श्रोताओं को बांधे रख सकते हैं । आपके शब्द ऐसे होने चाहिए कि बस सुनने वाला चैनल बदल ही न सके ।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

पद्मश्री अमीन सयानी

अपनी मखमली जादू भरी आवाज़ से दशकों तक हर उम्र के लोगों को सम्मोहित करने वाले आल इंडिया रेडियो के सबसे सफलतम संचालकों में से एक,अमीन सयानी को भारत सरकार ने ब्रॉडकास्टिंग के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए पदम् श्री से सम्मानित किया है.७७ वर्षीया सयानी हमेशा "बहनों और भाईयों" संबोधन से कार्यक्रम की शुरुआत किया करते थे,और गीतमाला,सिने कलाकारों की महफिल जैसे कार्यक्रमों से घर घर में पहचाने जाते थे. व्यवसायिक ब्राडकास्टिंग को नई बुलंदियां देने में उनका योगदान अतुलनीय है.

लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड २००५, के अनुसार उन्होंने ५४००० से अधिक रेडियो कार्यक्रमों का संचालन किया और लगभग १९००० प्रायोजित विज्ञापनों और स्पोट्स के माध्यम से अपनी आवाज़ भारत के आलावा, अमेरिका, कनाडा, श्री लंका, संयुक्त अरब अमीरात, न्यूजीलैंड, और ब्रिटन के श्रोताओं तक पहुंचाई. उनका एतिहासिक काउंट डाउन शो बिनाका गीत माला जो बाद में सिबाका गीत माला बना और फ़िर कोलगेट ने इसे प्रायोजित किया, ४६ वर्षों तक चला. पहले ये रेडियो सीलोन से सुनाई देता था. बाद में विविध भारती पर इसका प्रसारण जारी रहा. इस बेहद कामियाब संगीत काउंट डाउन को गीतों की लोकप्रियता का विश्वसनीय पैमाना माना जाता था, और सभी को इसका बेसब्री से इंतज़ार रहता था,
सख्शियत